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Section Appendix: Some remaining provisions of the allied countries are specified in the acts mentioned in the Property Tax Act.

The Wealth-Tax Act, 1957Central Act · Act 27 of 1957

परिशिष्ट

धन-कर अधिनियम में उल्लिखित सहबद्ध अधिनियमों के कुछ शेष उपबंध

कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 25

पूर्त या अन्य कंपनी के नाम से ''लिमिटेड'' शब्द जोड़ने से अभिमुक्ति देने की शक्ति

25. (1) जहां केन्द्रीय सरकार को समाधानप्रद रूप में यह साबित कर दिया जाता है कि कोर्इ संगम–

(क) परिसीमित कंपनी के रूप में वाणिज्य, कला, विज्ञान, धर्म, पूर्त या किसी अन्य उपयोगी उद्देश्य के लिए काम करने के लिए बनाया ही जाने वाला है, तथा

(ख) अपने लाभों को, यदि कोर्इ हों, या अन्य आय को अपने उद्देश्यों के लिए काम करने में लगाने का आशय रखती है तथा इस बात का उस पर प्रतिषेध है कि वह अपने सदस्यों को कोर्इ लाभांश दें,

वहां केन्द्रीय सरकार अनुज्ञप्ति के जरिए यह निदेश दे सकेगी कि वह परिसीमित दायित्व वाली कंपनी के रूप में संगम को उसके नाम में ''लिमिटेड'' शब्द या ''प्राइवेट लिमिटेड'' शब्द जोड़े बिना रजिस्ट्रीकृत कर लिया जाए।

(2) तदुपरि यह संगम तदनुसार रजिस्ट्रीकृत किया जा सकेगा; तथा रजिस्ट्रीकरण होने पर वह परिसीमित कंपनियों के सभी विशेषाधिकारों का उपभोग करेगा तथा (इस धारा के उपबंधों के अधीन रहते हुए) उनकी सभी बाध्यताओं के अधीन रहेगा।

(3) जहां केन्द्रीय सरकार को समाधानप्रद रूप में यह साबित कर दिया जाता है कि–

(क) किसी ऐसी कंपनी के उद्देश्य, जो इस अधिनियम के अधीन परिसीमित कंपनी के रूप में रजिस्ट्रीकृत की गर्इ है, उपधारा (1) के खंड (क) में विनिर्दिष्ट उद्देश्यों तक परिसीमित है, तथा

(ख) अपने गठन में कंपनी से यह बात अपेक्षित है कि वह अपने लाभों को, यदि कोर्इ हों या अन्य आय को अपने उद्देश्यों के लिए, काम करने में लगाए तथा उस पर यह प्रतिषेध है कि वह अपने सदस्यों को कोर्इ भी लाभांश न दे,

वहां केन्द्रीय सरकार अनुज्ञप्ति के जरिए कंपनी को प्राधिकृत कर सकेगी कि अपने विशेष संकल्प द्वारा वह अपने नाम को तब्दील कर ले, जिसके अंतर्गत अपने नाम में ''लिमिटेड'' शब्द को या ''प्राइवेट लिमिटेड'' शब्दों का जोड़ना या लुप्त कर देना आता है; तथा इस उपधारा के अधीन नाम तब्दील कर लेने के बारे में धारा 23 उसी प्रकार लागू होगी जैसे वह धारा 21 के अधीन नाम तब्दील करने को लागू होती है।

(4) कोर्इ फर्म इस धारा के अधीन अनुज्ञापित संगम या कम्पनी का सदस्य हो सकेगी किंतु उस फर्म के विघटन पर उसकी उस संगम या कंपनी की सदस्यता समाप्त हो जाएगी।

(5) इस धारा के अधीन कोर्इ अनुज्ञप्ति केन्द्रीय सरकार द्वारा ऐसी शर्तों पर और ऐसे विनियमों के अधीन रहते हुए, जैसी या जैसे वह ठीक समझती है, अनुदत्त की जा सकेगी तथा वे शर्तें और विनियम उस निकाय पर, जिसे अनुज्ञप्ति अनुदत्त की जाती है; आबद्ध कर होंगे तथा जहां कि यह अनुदान उपधारा (1) के अधीन है वहां यदि केन्द्रीय सरकार ऐसा निदेश देती है, तो वह ज्ञापन में या अनुच्छेदों में या भागत: पूर्वकथित में और भागत: पश्चात् कथित में अन्त:स्थापित किया जा सकेगा।

(6) किसी निकाय के लिए, जिसे ऐसी अनुज्ञप्ति दी जाती है, यह आवश्यक नहीं होगा कि वह अपने नाम के किसी भाग के रूप में ''लिमिटेड'' शब्द या ''प्राइवेट लिमिटेड'' शब्दों का प्रयोग करे तथा जब तक कि उसके अनुच्छेद अन्यथा उपबंधित नहीं करते हैं, तथा उस दशा में जिसमें कि केन्द्रीय सरकार ने साधारण या विशेष आदेश द्वारा ऐसा निदेश दिया है, उस निदेश में विनिर्दिष्ट विस्तार तक ऐसे निकाय को इस अधिनियम के ऐसे उपबंधों से छूट मिली रहेगी जैसे उसमें विनिर्दिष्ट किए जाएं।

(7) वह अनुज्ञप्ति केन्द्रीय सरकार द्वारा किसी भी समय प्रतिसंहृत की जा सकेगी तथा प्रतिसंहरण करने पर रजिस्ट्रार उस नाम के अंत में, जो उस निकाय का, जिसे अनुज्ञप्ति दी गर्इ थी, रजिस्टर में है, ''लिमिटेड'' शब्द या ''प्राइवेट लिमिटेड'' शब्दों को दर्ज कर देगा; तथा ऐसा निकाय इस धारा के अधीन दी गर्इ छूट का उपभोग करने से परिविरत हो जाएगा :

परन्तु केन्द्रीय सरकार इससे पूर्व कि कोर्इ अनुज्ञप्ति ऐसे प्रतिसंहृत की जाए, अपने आशय की सूचना उस निकाय को लिखित रूप में देगी तथा ऐसे प्रतिसंहरण के विरुद्ध सुनवार्इ का अवसर उस निकाय को देगी।

(8) (क) कोर्इ निकाय, जिसके बारे में इस धारा के अधीन कोर्इ अनुज्ञप्ति प्रवृत्त है, उन उपबंधों में, जो उसके ज्ञापन में उसके उद्देश्यों संबंधी है, कोर्इ परिवर्तन केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन के बिना, जो लिखित रूप में संज्ञापित किया जाएगा, न करेगा।

(ख) केन्द्रीय सरकार ऐसे निकाय की अनुज्ञप्ति का प्रतिसंहरण उस दशा में कर सकेगी जिसमें कि वह खंड (क) के उपबंधों का उल्लंघन करता है।

(ग) केन्द्रीय सरकार, खंड (क) में निर्दिष्ट अनुमोदन देते समय, उन शर्तों और विनियमों के, यदि कोर्इ हो, जिनके अधीन वह अनुज्ञप्ति पहले थी, बदले में या अतिरिक्त ऐसी शर्तों तथा विनियमों के अधीन करके, जैसी या जैसे वह सरकार ठीक समझती है, उस अनुज्ञप्ति में फेरफार कर सकेगी।

(घ) जहां किसी निकाय के ज्ञापन के उपबंधों में इस उपधारा के अधीन प्रस्थापित कोर्इ परिवर्तन उस निकाय के उद्देश्यों के बारे में जिस हद तक इस वास्ते अपेक्षित हो कि वह निकाय धारा 17 की उपधारा (1) के खंड (क) से (छ) तक में विनिर्दिष्ट किसी बात को करने के लिए समर्थ हो जाए, वहां उस हद तक इस धारा के उपबंध उस धारा के उपबंधों के अतिरिक्त, न कि उनके अल्पीकरण में होंगे।

(9) उस अनुज्ञप्ति का प्रतिसंहरण किए जाने पर, जो ऐसे निकाय को, जिसके नाम में ''वाणिज्य मंडल'' शब्द अन्तर्विष्ट हैं, इस धारा के अधीन अनुदत्त की गर्इ थी, वह निकाय प्रतिसंहरण किए जाने की तारीख से तीन मास के भीतर या ऐसी दीर्घतर कालावधि के भीतर, जैसी केन्द्रीय सरकार अनुज्ञात करना ठीक समझे, अपना नाम ऐसे नाम से बदल सकेगा जिसमें वे शब्द अन्तर्विष्ट नहीं हैं; तथा–

(क) उस सूचना में, जो उस निकाय को उपधारा (7) के उपबंधों के अधीन दी जाने वाली है, उस प्रभाव का विवरण दिया होगा जो इस उपधारा के पूर्वगामी उपबंधों का है; तथा

(ख) धारा 23 इस उपधारा के अधीन नाम तब्दील करने को उसी प्रकार लागू होगी जैसे वह धारा 21 के अधीन नाम की तब्दीली करने को लागू होती है।

(10) यदि कोर्इ निकाय उपधारा (9) की अपेक्षाओं का अनुपालन करने में व्यतिक्रम करता है, तो वह जुर्माने से, जो हर दिन के लिए, जिसके दौरान वह व्यतिक्रम चालू रहता है, पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा।

कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 85

शेयर पूंजी के दो प्रकार

85. (1) "अधिमानी शेयर पूंजी" से ऐसी किसी कंपनी के बारे में, जो शेयरों द्वारा परिसीमित है, भले ही वह इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व या पश्चात् बनी हो, उस कंपनी की शेयर पूंजी का वह भाग अभिप्रेत है, जिसके बारे में निम्नलिखित दोनों अपेक्षाएं पूरी होती हैं, अर्थात्–

(क) जहां तक लाभांश का संबंध है, उसके साथ यह अधिमानी अधिकार होता है या होगा कि एक नियत रकम या नियत दर पर संगणित रकम, चाहे वह कर मुक्त हो या उसके अधीन हो, दी जाएगी; और

(ख) जहां तक पूंजी का संबंध है, उसके साथ यह अधिमानी अधिकार परिसमापन पर या पूंजी वापस करने पर होता है या होगा कि समादत्त पूंजी या समादत्त समझी जाने वाली पूंजी, भले ही वह निम्नलिखित रकमों में से एक या दोनों के लिए जाने का अधिमान प्राप्त अधिकार हो या न हों, वापस की जाएगी, अर्थात्:-

(i) खंड (क) में विनिर्दिष्ट रकमों के संबंध में तारीख तक जो परिसमापन या पूंजी वापस किए जाने की तारीख है, असमादत्त रह गर्इ कोर्इ धनराशि; औेर

(ii) कोर्इ नियत प्रीमियम अथवा किसी नियत दर पर प्रीमियम, जो कंपनी के ज्ञापन या अनुच्छेदों में विनिर्दिष्ट है।

स्पष्टीकरण–पूंजी के संबंध में यह बात कि वह अधिमानी पूंजी है, इस बात के होते हुए भी मानी जाएगी कि उसे निम्नलिखित अधिकारों में से कोर्इ एक या दोनों अधिकार प्राप्त हैं, अर्थात्:–

(i) जहां तक लाभांश का संबंध है, खंड (क) में विनिर्दिष्ट रकम पर अधिमानी अधिकार के अतिरिक्त उसे यह अधिकार प्राप्त है कि चाहे पूर्णतया या परिसीमित मात्रा में, उनमें वह उस पूंजी के साथ भाग लें, जो पूर्वोक्त अधिमानी अधिकार की हकदार नहीं है;

(ii) जहां तक पूंजी का संबंध है, खंड (ख) में विनिर्दिष्ट रकमों को परिसमापन पर वापस करने के अधिमानी अधिकार के अतिरिक्त यह अधिकार है कि उस पूंजी के साथ, जो अधिकार की हकदार नहीं है, ऐसे किसी अधिशेष में चाहे पूर्णतया या परिसीमित मात्रा में, भाग लें जो पूरी पूंजी के वापस करने के पश्चात् शेष रहे।

(2) "साधारण शेयर पूंजी" से किसी ऐसी कंपनी के बारे में वह पूरी शेयर पूंजी अभिप्रेत है जो अधिमानी शेयर पूंजी नहीं है।

(3) "अधिमानी शेयर" तथा "साधारण शेयर" पदों का तदनुसार अर्थ लगाया जाएगा।

दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 360

सदाचरण की परिवीक्षा पर या प्रताड़ना के पश्चात् छोड़े जाने का आदेश

360. (1) जब कोर्इ व्यक्ति जो इक्कीस वर्ष से कम आयु का नहीं है केवल जुर्माने से या सात वर्ष या उससे कम अवधि के कारावास से दण्डनीय अपराध के लिए दोषसिद्ध किया जाता अथवा जब कोर्इ व्यक्ति जो इक्कीस वर्ष से कम आयु का है या कोर्इ स्त्री, ऐसे अपराध के लिए, जो मृत्यु या आजीवन कारावास से दण्डनीय नहीं है, दोषसिद्ध की जाती है और अपराधी के विरुद्ध कोर्इ पूर्व दोषसिद्धि साबित नहीं की गर्इ है तब, यदि उस न्यायालय को, जिसके समक्ष उसे दोषसिद्ध किया गया है, अपराधी की आयु, शील या पूर्ववृत्त को और उन परिस्थितियों को, जिनमें अपराध किया गया, ध्यान में रखते हुए यह प्रतीत होता है कि अपराधी को सदाचरण की परिवीक्षा पर छोड़ देना समीचीन है तो न्यायालय उसे तुरन्त कोर्इ दण्डादेश देने के बजाय निदेश देता है कि उसे प्रतिभुओं सहित या रहित उसके द्वारा यह बंधपत्र लिख देने पर छोड़ दिया जाए कि वह (तीन वर्ष से अनधिक) इतनी अवधि के दौरान, जितनी न्यायालय निर्दिष्ट करे, बुलाए जाने पर हाजिर होगा और दण्डादेश पाएगा और इस बीच परिशांति कायम रखेगा और सदाचारी बना रहेगा :

परन्तु जहां कोर्इ प्रथम अपराधी किसी द्वितीय वर्ग मजिस्ट्रेट द्वारा, जो उच्च न्यायालय द्वारा विशेषतया सशक्त नहीं किया गया है, दोषसिद्ध किया जाता है और मजिस्ट्रेट की यह राय है कि इस धारा द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग किया जाना चाहिए वहां वह उस भाव की अपनी राय अभिलिखित करेगा और प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट को वह कार्यवाही निवेदित करेगा और उस अभियुक्त को उस मजिस्ट्रेट के पास भेजेगा अथवा उसकी उस मजिस्ट्रेट के समक्ष हाजिरी के लिए जमानत लेगा और वह मजिस्ट्रेट उस मामले का निपटारा उपधारा (2) द्वारा उपबंधित रीति से करेगा।

(2) जहां कोर्इ कार्यवाही प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट को उपधारा (1) द्वारा उपबंधित रूप में निवेदित की गर्इ है, वहां ऐसा मजिस्ट्रेट उस पर ऐसा दण्डादेश या आदेश दे सकता है जैसा यदि मामला मूलत: उसके द्वारा सुना गया होता तो वह दे सकता और यदि वह किसी प्रश्न पर अतिरिक्त जांच या अतिरिक्त साक्ष्य आवश्यक समझता है तो वह स्वयं ऐसी जांच कर सकता है या ऐसा साक्ष्य ले सकता है अथवा ऐसी जांच किए जाने या ऐसा साक्ष्य लिए जाने का निदेश दे सकता है।

(3) किसी ऐसी दशा में, जिसमें कोर्इ व्यक्ति चोरी, किसी भवन में चोरी, बेर्इमानी से दुर्विनियोग, छल या भारतीय दण्ड संहिता के अधीन दो वर्ष से अनधिक के कारावास से दण्डनीय किसी अपराध के लिए या केवल जुर्माने से दण्डनीय किसी अपराध के लिए दोषसिद्ध किया जाता है और उसके विरुद्ध कोर्इ पूर्व दोषसिद्धि साबित नहीं की गर्इ है, यदि वह न्यायालय, जिसके समक्ष वह ऐसे दोषसिद्ध किया गया है, ठीक समझे, तो वह अपराधी की आयु, शील, पूर्ववृत्त या शारीरिक या मानसिक दशा को और अपराध की तुच्छ प्रकृति को, या किन्हीं परिशमनकारी परिस्थितियों को, जिनमें अपराध किया गया था, ध्यान में रखते हुए उसे कोर्इ दण्डादेश देने के बजाय सम्यक् भत्र्सना के पश्चात् छोड़ सकता है।

(4) इस धारा के अधीन आदेश किसी अपील न्यायालय द्वारा या उच्च न्यायालय या सेशन न्यायालय द्वारा भी किया जा सकेगा जब वह अपनी पुनरीक्षण शक्तियों का प्रयोग कर रहा हो।

(5) जब किसी अपराधी के बारे में इस धारा के अधीन आदेश दिया गया है तब उच्च न्यायालय या सेशन न्यायालय, उस दशा में जब उस न्यायालय में अपील करने का अधिकार है, अपील किए जाने पर, या अपनी पुनरीक्षण शक्तियों का प्रयोग करते हुए, ऐसे आदेश को अपास्त कर सकता है और ऐसे अपराधी को उसके बदले में विधि अनुसार दण्डादेश दे सकता है :

परन्तु उच्च न्यायालय या सेशन न्यायालय इस उपधारा के अधीन उस दण्ड से अधिक दण्ड न देगा जो उस न्यायालय द्वारा दिया जा सकता था जिसके द्वारा अपराधी दोषसिद्ध किया गया था।

(6) धारा 121, 124 और 373 के उपबंध इस धारा के उपबंधों के अनुसरण में पेश किए गए प्रतिभुओं के बारे में, जहां तक हो सके, लागू होंगे।

(7) किसी अपराधी के उपधारा (1) के अधीन छोड़े जाने का निदेश देने के पूर्व न्यायालय अपना समाधान कर लेगा कि उस अपराधी का, या उसके प्रतिभू का (यदि कोर्इ हो) कोर्इ नियत वास स्थान या नियमित उपजीविका उस स्थान में है जिसके संबंध में वह न्यायालय कार्य करता है या जिसमें अपराधी के उस अवधि के दौरान रहने की सम्भाव्यता है, जो शर्तों के पालन के लिए उल्लिखित की गर्इ है।

(8) यदि उस न्यायालय का, जिसने अपराधी को दोषसिद्ध किया है, या उस न्यायालय का, जो अपराधी के संबंध में उसके मूल अपराध के बारे में कार्यवाही कर सकता था, समाधान हो जाता है कि अपराधी अपने मुचलके की शर्तों में से किसी का पालन करने में असफल रहा है तो वह उसके पकड़े जाने के लिए वारंट जारी कर सकता है।

(9) जब कोर्इ अपराधी ऐसे किसी वारंट पर पकड़ा जाता है तब वह वारंट जारी करने वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष तत्काल लाया जाएगा और वह न्यायालय या तो तब तक के लिए उसे अभिरक्षा में रखे जाने के लिए प्रतिप्रेषित कर सकता है जब तक मामले में सुनवार्इ न हो, या इस शर्त पर कि वह दण्डादेश के लिए हाजिर होगा, पर्याप्त प्रतिभूति लेकर जमानत मंजूर कर सकता है और ऐसा न्यायालय मामले की सुनवार्इ के पश्चात् दण्डादेश दे सकता है।

(10) इस धारा की कोर्इ बात अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958 (1958 का 20) या बालक अधिनियम, 1960 (1960 का 60) या किशोर अपराधियों के उपचार, प्रशिक्षण या सुधार से संबंधित तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के उपबंधों पर प्रभाव नहीं डालेगी।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 126

वृत्तिक संसूचनाएं

126. कोर्इ भी बैरिस्टर, अटर्नी, प्लीडर या वकील अपने कक्षीकार (क्लार्इंट) की अभिव्यक्त सम्मति के सिवाय ऐसी किसी संसूचना को प्रकट करने के लिए, जो उसके ऐसे बैरिस्टर, अटर्नी, प्लीडर या वकील की हैसियत में नियोजन के अनुक्रम में, या के प्रयोजनार्थ उसके कक्षीकार द्वारा या उसकी ओर से उसे दी गर्इ हो अथवा किसी दस्तावेज की, जिससे वह अपने वृतिक नियोजन के अनुक्रम में या के प्रयोजनार्थ परिचित हो गया है, अन्तर्वस्तु या दशा कथित करने को अथवा किसी सलाह को, जो ऐसे नियोजन के अनुक्रम में था, के प्रयोजनार्थ उसने अपने कक्षीकार को दी है, प्रकट करने के लिए किसी भी समय अनुज्ञात नहीं किया जाएगा :

परन्तु इस धारा की कोर्इ भी बात निम्नलिखित बात को प्रकटीकरण से संरक्षण न देगी–

(1) किसी भी अवैध प्रयोजन को अग्रसर करने में दी गर्इ कोर्इ भी ऐसी संसूचना,

(2) ऐसा कोर्इ भी तथ्य जो किसी बैरिस्टर, प्लीडर, अटर्नी या वकील ने अपनी ऐसी हैसियत में नियोजन के अनुक्रम में संप्रेक्षित किया हो, और जिससे दर्शित हो कि उसके नियोजन के प्रारम्भ के पश्चात् कोर्इ अपराध या कपट किया गया है।

यह तत्वहीन है कि ऐसे बैरिस्टर, प्लीडर, अटर्नी या वकील का ध्यान ऐसे तथ्य के प्रति उसके कक्षीकार के द्वारा या की ओर से आकर्षित किया गया था या नहीं।

स्पष्टीकरण–इस धारा में कथित बाध्यता नियोजन के अवसित हो जाने के उपरान्त भी बनी रहती है।

दृष्टांत

(क) कक्षीकार क, अटर्नी ख से कहता है, "मैंने कूटरचना की है और मेैं चाहता हूं कि आप मेरी प्रतिरक्षा करें"।

यह संसूचना प्रकटन से संरक्षित है, क्योंकि ऐसे व्यक्ति की प्रतिरक्षा आपराधिक प्रयोजन नहीं है, जिसका दोषी होना ज्ञात हो।

(ख) कक्षीकार क, अटर्नी ख से कहता है, "मैं सम्पत्ति पर कब्जा कूटरचित विलेख के उपयोग द्वारा अभिप्राप्त करना चाहता हूँ और इस आधार पर वाद लाने की मैं आपसे प्रार्थना करता हूं"।

यह संसूचना आपराधिक प्रयोजन के अग्रसर करने में की गर्इ होने से प्रकटन से संरक्षित नहीं है।

(ग) क पर गबन का आरोप लगाए जाने पर वह अपनी प्रतिरक्षा करने के लिए अटर्नी ख को प्रतिधारित करता है। कार्यवाही के अनुक्रम में ख देखता है कि क की लेखाबही में यह प्रविष्टि की गर्इ है कि क द्वारा उतनी रकम देनी है जितनी के बारे में अभिकथित है कि उसका गबन किया गया है, जो प्रविष्टि उसके नियोजन के आरम्भ के समय उस बही में नहीं थी।

यह ख द्वारा अपने नियोजन के अनुक्रम में सम्प्रेक्षित ऐसा तथ्य होने से, जिससे दर्शित होता है कि कपट उस कार्यवाही के प्रारम्भ होने के पश्चात् किया गया है, प्रकटन से संरक्षित नहीं है।

भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 21

''लोक सेवक''

21. ''लोक सेवक'' शब्द उस व्यक्ति का द्योतक है जो एतस्मिनपश्चात् निम्नगत वर्णनों में से किसी में आता है, अर्थात् :–

[पहला खंड लोप किया गया]

दूसरा - भारत की सेना, नौसेना या वायुसेना का हर आयुक्त आफिसर;

तीसरा - हर न्यायाधीश जिसके अंतर्गत ऐसा कोर्इ भी व्यक्ति आता है जो किन्हीं न्यायनिर्णायक कृत्यों का चाहे स्वयं या व्यक्तियों के किसी निकाय के सदस्य के रूप में निर्वहन करने के लिए विधि द्वारा सशक्त किया गया हो;

चौथा - न्यायालय का हर आफिसर (जिसके अंतर्गत समापक, रिसीवर या कमिश्नर आता है) जिसका ऐसे आफिसर के नाते यह कर्त्तव्य हो कि वह विधि या तथ्य के किसी मामले में अन्वेषण या रिपोर्ट करे, या कोर्इ दस्तावेज बनाए, अधिप्रमाणीकृत करे, या रखे, या किसी सम्पत्ति का भार संभाले या उस सम्पत्ति का व्ययन करे, या किसी न्यायिक आदेशिका का निष्पादन करे, या कोर्इ शपथ ग्रहण कराए या निर्वचन करे, या न्यायालय में व्यवस्था बनाए रखे और हर व्यक्ति, जिसे ऐसे कर्त्तव्यों में से किन्हीं का पालन करने का प्राधिकार न्यायालय द्वारा विशेष रूप से दिया गया हो;

पांचवां - किसी न्यायालय या लोक सेवक की सहायता करने वाला हर जूरी सदस्य, असेसर या पंचायत का सदस्य;

छठा - हर मध्यस्थ या अन्य व्यक्ति, जिनको किसी न्यायालय द्वारा, या किसी अन्य सक्षम लोक प्राधिकारी द्वारा कोर्इ मामला या विषय, विनिश्चय या रिपोर्ट के लिए निर्देशित किया गया हो;

सातवां - हर व्यक्ति जो किसी ऐसे पद को धारण करता हो, जिसके आधार से वह किसी व्यक्ति को परिरोध में करने या रखने के लिए सशक्त हो;

आठवां - सरकार का हर आफिसर जिसका ऐसे आफिसर के नाते यह कर्त्तव्य हो कि वह अपराधों का निवारण करे, अपराधों की इतिला दे, अपराधियों को न्याय के लिए उपस्थिति करे, या लोक के स्वास्थ्य, क्षेम या सुविधा की संरक्षा करे;

नवां - हर आफिसर जिसका ऐसे आफिसर के नाते यह कर्त्तव्य हो कि वह सरकार की ओर से किसी सम्पत्ति को ग्रहण करे, प्राप्त करे, रखे या व्यय करे, या सरकार की ओर से कोर्इ सर्वेक्षण, निर्धारण या संविदा करे, या किसी राजस्व आदेशिका का निष्पादन करे या सरकार के धन-संबंधी हितों पर प्रभाव डालने वाले किसी मामले में अन्वेषण या रिपोर्ट करे या सरकार के धन-संबंधी हितों से संबंधित किसी दस्तावेज को बनाए, अधिप्रमाणीकृत करे या रखे, या सरकार के धन-संबंधी हितों की संरक्षा के लिए किसी विधि के व्यतिक्रम को रोके;

दसवां - हर आफिसर, जिसका ऐसे आफिसर के नाते यह कर्त्तव्य हो कि वह किसी ग्राम, नगर या जिले के किसी धर्मनिरपेक्ष सामान्य प्रयोजन के लिए किसी सम्पत्ति को ग्रहण करे, प्राप्त करे, रखे या व्यय करे, कोर्इ सर्वेक्षण या निर्धारण करे, या कोर्इ रेट या कर उद्गृहीत करे, या किसी ग्राम, नगर या जिले के लोगों के अधिकारों के अभिनिश्चयन के लिए कोर्इ दस्तावेज बनाए, अधिप्रमाणीकृत करे या रखे;

ग्यारहवां - हर व्यक्ति जो कोर्इ ऐसा पद धारण करता हो जिसके आधार से वह निर्वाचक नामावली तैयार करने, प्रकाशित करने, बनाए रखने या पुनरीक्षित करने के लिए या निर्वाचन के किसी भाग को संचालित करने के लिए सशक्त हो;

बारहवां - हर व्यक्ति, जो–

(क) सरकार की सेवा या वेतन में हो, या किसी लोक-कर्त्तव्य में पालन के लिए सरकार से फीस या कमीशन के रूप में पारिश्रमिक पाता हो;

(ख) स्थानीय प्राधिकारी की, अथवा केन्द्र, प्रान्त या राज्य के अधिनियम के द्वारा या अधीन स्थापित निगम की अथवा कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 617 में यथा परिभाषित सरकारी कम्पनी की सेवा या वेतन में हो।

दृष्टांत

नगरपालिका आयुक्त लोक सेवक है।

स्पष्टीकरण 1 - ऊपर के वर्णनों में से किसी में आने वाले व्यक्ति लोक सेवक हैं, चाहे वे सरकार द्वारा नियुक्त किए गए हों या नहीं।

स्पष्टीकरण 2 - जहां कहीं ''लोक सेवक'' शब्द आए हैं, वे उस हर व्यक्ति के संबंध में समझे जाएंगे जो लोक सेवक के ओहदे को वास्तव में धारण किए हुए हों, चाहे उस ओहदे को धारण करने के उसके अधिकार में कैसी ही विधिक त्रुटि हो।

स्पष्टीकरण 3 - ''निर्वाचन'' शब्द ऐसे किसी विधायी, नगरपालिका या अन्य लोक प्राधिकारी के नाते, चाहे वह कैसे ही स्वरूप का हो, सदस्यों के वरणार्थ निर्वाचन का द्योतक है जिसके लिए वरण करने की पद्धति किसी विधि के द्वारा या अधीन निर्वचन के रूप में विहित की गर्इ हो।

भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 193

मिथ्या साक्ष्य के लिए दण्ड

193. जो कोर्इ साशय किसी न्यायिक कार्यवाही के किसी प्रक्रम में मिथ्या साक्ष्य देगा या किसी न्यायिक कार्यवाही के किसी प्रक्रम में उपयोग में लाए जाने के प्रयोजन से, मिथ्या साक्ष्य गढ़ेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी दण्डित किया जाएगा, और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा ;

और जो कोर्इ किसी अन्य मामले में साशय मिथ्या साक्ष्य देगा या गढ़ेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, दंडित किया जाएगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा।

स्पष्टीकरण 1 - सेना न्यायालय के समक्ष विचारण न्यायिक कार्यवाही है।

स्पष्टीकरण 2- न्यायालय के समक्ष कार्यवाही प्रारम्भ होने के पूर्व जो विधि द्वारा निर्दिष्ट अनवेषण होता है। वह न्यायिक कार्यवाही का एक प्रक्रम है, चाहे वह अन्वेषण किसी न्यायालय के सामने न भी हो।

दृष्टांत

यह अभिनिश्चय करने के प्रयोजन से कि क्या य को विचारण के निए सुपुर्द किया जाना चाहिए, मजिस्ट्रेट के समक्ष जांच में क शपथ पर कथन करता है, जिसका वह मिथ्या होना जानता है। यह जांच न्यायिक कार्यवाही का एक प्रक्रम है, इसलिए क ने मिथ्या साक्ष्य दिया है।

स्पष्टीकरण 3 - न्यायालय द्वारा विधि के अनुसार निर्दिष्ट और न्यायालय के प्राधिकार के अधीन संचालित अन्वेषण न्यायिक कार्यवाही का एक प्रक्रम है, चाहे वह अन्वेषण किसी न्यायालय के सामने न भी हो।

दृष्टांत

संबंधित स्थान पर जाकर भूमि की सीमाओं को अभिनिश्चित करने के लिए न्यायालय द्वारा प्रतिनियुक्त आफिसर के समक्ष जांच में क शपथ पर कथन करता है जिसका मिथ्या होना वह जानता है। यह जांच न्यायिक कार्यवाही का एक प्रक्रम है, इसलिए क ने मिथ्या साक्ष्य दिया है।

भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 196

उस साक्ष्य को काम में लाना जिसका मिथ्या होना ज्ञात हो

196. जो कोर्इ किसी साक्ष्य को, जिसके मिथ्या होने या गढ़े होने की बात वह जानता है, सही या प्रामाणिक साक्ष्य के रूप में भ्रष्टतापूर्वक काम में लाता है या उपयोग में लाने का प्रयत्न करता है, वह उसी रीति में दंडित किया जाएगा मानो कि उसने मिथ्या साक्ष्य दिया है या गढ़ा है।

भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 228

न्यायिक कार्यवाही में बैठे लोक सेवक का साशय अपमान या उसके कार्य में विघ्न

228. जो कोर्इ किसी लोक सेवक का उस समय, जबकि ऐसा लोक सेवक न्यायिक कार्यवाही के किसी प्रक्रम पर बैठा है, साशय कोर्इ अपमान करता है या उसके कार्य में विघ्न डालता है, वह सादा कारावास से जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडित किया जाएगा।

संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 की धारा 53क

भागिक पालन

53क. जहां कि कोर्इ व्यक्ति किसी स्थावर सम्पत्ति को प्रतिफलार्थ अन्तरित करने के लिए अपने द्वारा अपनी ओर से हस्ताक्षरित लेखबद्ध ऐसी संविदा करता है जिससे उस अन्तरण को गठित करने के लिए आवश्यक निबंधन युक्तियुक्त निश्चय के साथ अभिनिश्चित किए जा सकते हैं,

और अन्तरिती ने संविदा के भागिक पालन में उस सम्पत्ति या उसके किसी भाग का कब्जा ले लिया है या अन्तरिती जिसका कब्जा पहले से ही है, संविदा के भागिक पालन में अपना कब्जा चालू रखता है और उस संविदा को अग्रसर करने के लिए कोर्इ कार्य कर चुका है,

और अंतरिती संविदा के अपने भाग का पालन कर चुका है या पालन करने के लिए रजामन्द है,

वहां इस बात के होते हुए भी कि संविदा, यद्यपि उसका रजिस्ट्रीकरण अपेक्षित है, रजिस्ट्रीकृत नहीं की गर्इ है या जहां कि अन्तरण की कोर्इ लिखत है, वहां पर अन्तरण किसी तत्समय प्रवृत्त विधि द्वारा उसके लिए विहित रीति से पूरा नहीं किया गया है, अन्तरक या उससे व्युत्पन्न अधिकार के अधीन दावा करने वाला कोर्इ व्यक्ति अन्तरिती या उससे व्युत्पन्न अधिकार के अधीन दावा करने वाले व्यक्तियों के विरुद्ध उस सम्पत्ति के विषय में जिसका कब्जा अन्तरिती ने ले लिया है या चालू रखा है कोर्इ भी ऐसा अधिकार जो संविदा के निबंधनों द्वारा अभिव्यक्त रूप से उपबंधित अधिकार से भिन्न है, प्रवर्तित कराने से विवर्जित होगा :

परन्तु इस धारा की कोर्इ बात ऐसे सप्रतिफल अन्तरिती के अधिकारों पर प्रभाव नहीं डालेगी जिसे उस संविदा या उसके भागिक पालन की कोर्इ सूचना न हो।

Where this provision sits

ActThe Wealth-Tax Act, 1957
SectionAppendix
Marginal noteSome remaining provisions of the allied countries are specified in the acts mentioned in the Property Tax Act.
JurisdictionCentral
StatusIn force as published by the source

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Need this as data, not as a page? The Wealth-Tax Act, 1957 is one of 49,000+ enactments on CourtMesh. The Indian court cases API serves the case law that cites these provisions over JSON, with API documentation and plans and pricing. See also the judgment library.